"सहमति और सत्य की जानकारी के बीच धोखाधड़ी का स्थान नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विवाहित पुरुष के विरुद्ध महिला की अपील खारिज की, पूर्व जानकारी को माना आधार।"

"सहमति और सत्य की जानकारी के बीच धोखाधड़ी का स्थान नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विवाहित पुरुष के विरुद्ध महिला की अपील खारिज की, पूर्व जानकारी को माना आधार।"

बिलासपुर उच्च न्यायालय के जस्टिस संजय एस अग्रवाल की एकल पीठ ने एक महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला किसी पुरुष के विवाहित होने के तथ्य से पूर्णतः अवगत होने के उपरांत भी उसके साथ संबंध स्थापित करती है, तो वह बाद में 'शादी का झांसा' देकर शारीरिक शोषण या धोखाधड़ी का आरोप नहीं लगा सकती।

न्यायालय ने डोंगरगढ़ की एक महिला द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत के बरी करने के फैसले को यथावत रखा। कोर्ट ने पाया कि महिला को पुरुष की पहली पत्नी के अस्तित्व की जानकारी थी, अतः 'विश्वास में लेकर छल करने' (Deceit) का विधिक आधार यहाँ निष्प्रभावी हो जाता है।


महत्वपूर्ण कानूनी जानकारी (Legal Insights)

इस मामले में न्यायालय ने मुख्य रूप से निम्नलिखित धाराओं और अधिनियमों की व्याख्या की है:

1. भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 493

  • प्रावधान: यह धारा उस पुरुष को दंडित करती है जो किसी महिला को 'धोखाधड़ी' से यह विश्वास दिलाता है कि वह उसका वैध रूप से विवाहित पति है और इस विश्वास के आधार पर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाता है।

  • कोर्ट की टिप्पणी: हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 493 का मुख्य तत्व 'धोखाधड़ी' (Deceit) है। यदि महिला पहले से जानती है कि पुरुष विवाहित है, तो वहां पुरुष द्वारा महिला को भ्रम में रखने का कोई आधार शेष नहीं रहता।

2. हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act), 1955

  • धारा 5 (i): इसके अनुसार, एक वैध हिंदू विवाह के लिए अनिवार्य शर्त यह है कि विवाह के समय किसी भी पक्ष का जीवनसाथी (पति या पत्नी) जीवित न हो।

  • धारा 11 (शून्य विवाह): यदि कोई व्यक्ति पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करता है या इकरारनामा करता है, तो वह विवाह कानूनन 'शून्य' (Void) माना जाता है।

  • निष्कर्ष: कोर्ट ने माना कि चूंकि आरोपी पहले से विवाहित था, इसलिए महिला के साथ किया गया 'शादी का इकरारनामा' कानून की नजर में शून्य था।

3. 'सहमति' बनाम 'धोखा' (Consent vs. Deceit)

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब दोनों पक्षों को वस्तुस्थिति (Status) का ज्ञान हो, तो उनके बीच के संबंध को 'शादी के झूठे वादे' की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। कानूनी रूप से यह 'आपसी सहमति' का मामला माना जाता है, न कि अपराधिक विश्वासघात का।


विधिक निष्कर्ष: यह फैसला यह रेखांकित करता है कि कानून उन मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता जहाँ वयस्क पक्षकार परिणामों और तथ्यों को जानते हुए अपनी इच्छा से संबंध बनाते हैं।

कंचन यादव 

सहसंपादक /नारद एक्स्प्रेस न्यूज 

सहसंपादक/नारद एक्स्प्रेस न्यूज