बुराई पर अच्छाई की जीत: कब है होलिका दहन? जानें सटीक तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

बुराई पर अच्छाई की जीत: कब है होलिका दहन? जानें सटीक तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

छत्तीसगढ़/रायपुर: फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला होलिका दहन का पर्व न केवल रंगों के आगमन का प्रतीक है, बल्कि यह अधर्म पर धर्म की विजय का उद्घोष भी है। इस वर्ष होलिका दहन की तिथि और भद्रा काल के समय को लेकर विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। आइए जानते हैं इस पावन पर्व से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी।


1. तिथि और शुभ मुहूर्त (2026)

हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमा की तिथि और प्रदोष काल का मेल होलिका दहन के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।

  • होलिका दहन की तिथि: 3 मार्च, 2026 (मंगलवार)

  • होलिका दहन का शुभ मुहूर्त: शाम 06:22 बजे से रात 08:47 बजे तक।

  • भद्रा काल: ज्योतिष गणना के अनुसार, इस वर्ष भद्रा का साया शाम होने से पूर्व ही समाप्त हो जाएगा, जिससे प्रदोष काल में पूजन करना अत्यंत शुभ रहेगा।


2. होलिका दहन का आध्यात्मिक महत्व

होलिका दहन की कथा भक्त प्रहलाद और उनकी अटूट श्रद्धा से जुड़ी है। असुर राजा हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रहलाद को मारने के लिए अपनी बहन 'होलिका' की गोद में बिठाकर अग्नि में डाल दिया था। होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रहलाद सुरक्षित बच गए और होलिका भस्म हो गई।

संदेश: यह पर्व हमें सिखाता है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी विकट क्यों न हों, ईश्वर पर अटूट विश्वास रखने वालों की अंततः जीत होती है और अहंकार व बुराई का नाश निश्चित है।


3. पूजन विधि: कैसे करें पूजा?

शास्त्रों के अनुसार, होलिका पूजन से घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है।

  1. तैयारी: होलिका दहन के स्थान पर गोबर के उपले, सूखी लकड़ी और घास एकत्र करें।

  2. सामग्री: पूजा की थाली में रोली, अक्षत, फूल, कच्चा सूत, साबुत हल्दी, मूंग, बताशे और एक लोटा जल रखें।

  3. परिक्रमा: होलिका के चारों ओर कच्चे सूत को लपेटते हुए 3, 5 या 7 बार परिक्रमा करें।

  4. अर्पण: नई फसल (जैसे चने की बालियां या गेहूं की बालियां) को अग्नि में अर्पित करें। दहन के बाद इसकी राख को माथे पर लगाना बेहद शुभ माना जाता है।


4. सुख-समृद्धि के लिए विशेष उपाय

  • नकारात्मकता का नाश: घर के प्रत्येक सदस्य को होलिका की अग्नि में काले तिल और पीली सरसों डालनी चाहिए, मान्यता है कि इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है।

  • स्वास्थ्य लाभ: होलिका की अग्नि से निकली गर्मी शरीर के कीटाणुओं का नाश करती है और ऋतु परिवर्तन के दौरान होने वाली बीमारियों से रक्षा करती है।


सावधानी: पर्यावरण का रखें ध्यान

पर्व की पवित्रता बनाए रखने के लिए सूखे पत्तों और लकड़ियों का ही प्रयोग करें। प्लास्टिक या अन्य हानिकारक रसायनों को अग्नि में न डालें, ताकि वातावरण प्रदूषित न हो।

होलिका दहन की पूजा के दौरान मंत्रों का उच्चारण वातावरण को शुद्ध करता है और मानसिक शांति प्रदान करता है। यहाँ मुख्य मंत्र और उनके अर्थ दिए गए हैं, जिनका प्रयोग आप पूजा के समय कर सकते हैं:


1. पूजा की शुरुआत में (पवित्रिकरण मंत्र)

सबसे पहले अपने ऊपर और पूजा सामग्री पर जल छिड़कते हुए इस मंत्र का जाप करें ताकि शुद्धि हो सके:

"ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥"

अर्थ: चाहे कोई अपवित्र हो या पवित्र, जो भी पुण्डरीकाक्ष (भगवान विष्णु) का स्मरण करता है, वह बाहर और भीतर से शुद्ध हो जाता है।


2. अर्घ्य दान मंत्र (जल अर्पण करते समय)

होलिका को जल अर्पित करते समय इस मंत्र को बोलें:

"प्रह्लादभक्तवत्सलाय नमः।"

अर्थ: भक्त प्रह्लाद पर स्नेह रखने वाले भगवान विष्णु को नमस्कार है।


3. होलिका पूजन का मुख्य मंत्र

होलिका की पूजा करते समय और उन पर अक्षत, फूल अर्पित करते समय इस मंत्र का जाप करें:

"असृक्पाभयसन्त्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः। अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव॥"

अर्थ: हे होलिका! अज्ञानी लोगों ने रक्तपिपासु राक्षसों के डर से तुम्हारी रचना की थी, इसलिए मैं तुम्हारी पूजा करता हूँ। तुम समस्त प्राणियों के लिए ऐश्वर्य और सुख प्रदान करने वाली बनो।


4. परिक्रमा करते समय (सूत लपेटते वक्त)

जब आप होलिका की परिक्रमा करें और कच्चा सूत लपेटें, तब भगवान विष्णु (नरसिंह अवतार) का ध्यान करते हुए इस सरल मंत्र का जाप करें:

"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः" या "ॐ नृसिंहाय नमः"


5. अग्नि को अन्न अर्पण करते समय

जब आप नई फसल (गेहूं की बाली या चना) अग्नि में डालें:

"ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्री सिद्धलक्ष्म्यै नमः" (यह मंत्र घर में अन्न और धन की बरकत के लिए बोला जाता है।)


पूजा के बाद क्षमा प्रार्थना

पूजा के अंत में हाथ जोड़कर अनजाने में हुई भूल के लिए यह मंत्र जरूर बोलें:

"आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥"

अर्थ: हे प्रभु! मैं न आपका आह्वान (बुलाना) जानता हूँ, न विसर्जन। मैं पूजा की विधि भी नहीं जानता, कृपया मेरी भूलों को क्षमा करें।


एक छोटी सी सलाह:

यदि आपको संस्कृत मंत्र कठिन लगें, तो आप शुद्ध मन से "जय श्री कृष्ण" या "ओम नमो नारायण" का जाप भी कर सकते हैं। ईश्वर भाव देखते हैं, शब्द नहीं।

रिपोर्टर:कंचन यादव 

नारद एक्स्प्रेस न्यूज