ओवरटाइम के नाम पर 100 करोड़ का 'खेल'

ओवरटाइम के नाम पर 100 करोड़ का 'खेल'

छत्तीसगढ़ स्टेट मार्केटिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड (CSMCL) में हुए इस नए घोटाले ने प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है। जांच में सामने आया है कि वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच मैनपावर और प्लेसमेंट एजेंसियों के माध्यम से ओवरटाइम भत्ते के नाम पर 100 करोड़ रुपये से अधिक की बंदरबांट की गई।

घोटाले का तरीका (Modus Operandi)

  1. फर्जी भुगतान: सरकारी शराब दुकानों में तैनात कर्मचारियों को अतिरिक्त कार्य के बदले 'ओवरटाइम' भत्ता दिया जाना था।

  2. एजेंसियों की मिलीभगत: CSMCL के अधिकारियों ने 'ईगल हंटर सॉल्यूशन' और 'अलर्ट कमांडोज' जैसी एजेंसियों के साथ मिलकर षड्यंत्र रचा।

  3. कमीशन का सिंडिकेट: एजेंसियों को ओवरटाइम के भारी-भरकम बिलों का भुगतान किया गया, लेकिन यह राशि कर्मचारियों तक नहीं पहुंची। इसके बजाय, भुगतान का एक बड़ा हिस्सा रिश्वत और कमीशन के रूप में वापस आबकारी अधिकारियों और अनवर ढेबर तक पहुँचाया गया।


गिरफ्तारी और कस्टोडियल रिमांड

इस मामले में EOW ने सघन कार्रवाई करते हुए कड़ियां जोड़ना शुरू कर दिया है:

  • नवीन प्रताप सिंह तोमर की गिरफ्तारी: 19 फरवरी को आबकारी उपायुक्त नवीन तोमर को गिरफ्तार किया गया। ED की जांच में सामने आया था कि एजेंसियों से प्राप्त 28.8 लाख रुपये का कैश तोमर तक पहुँचाया जाना था।

  • अनवर ढेबर पर शिकंजा: रायपुर सेंट्रल जेल में पहले से बंद अनवर ढेबर को 23 फरवरी को विशेष न्यायालय में पेश किया गया। न्यायालय ने ढेबर को पुलिस रिमांड पर भेज दिया है।

  • आमने-सामने पूछताछ: अब जांच टीम नवीन तोमर और अनवर ढेबर को आमने-सामने बैठाकर पूछताछ करेगी, ताकि भ्रष्टाचार के इस ऊंचे नेटवर्क का पर्दाफाश हो सके।


ED की FIR और 3200 करोड़ का महा-घोटाला

यह ताजा मामला उस बड़े शराब घोटाले का हिस्सा है जिसकी जांच प्रवर्तन निदेशालय (ED) लंबे समय से कर रही है।

मुख्य बिंदु:

  • ED के अनुसार, तत्कालीन भूपेश सरकार के कार्यकाल में 3,200 करोड़ रुपये से अधिक का घोटाला हुआ।

  • इस सिंडिकेट का नेतृत्व कथित तौर पर IAS अधिकारी अनिल टुटेजा, आबकारी विभाग के एमडी ए.पी. त्रिपाठी और कारोबारी अनवर ढेबर कर रहे थे।


निष्कर्ष और भविष्य की कार्रवाई

EOW की हालिया कार्रवाई से स्पष्ट है कि शराब घोटाले की जड़ें केवल शराब की बिक्री तक सीमित नहीं थीं, बल्कि मैनपावर और प्रशासनिक खर्चों में भी भारी हेरफेर किया गया था। आने वाले दिनों में आबकारी विभाग के कई अन्य बड़े अधिकारियों और शराब कारोबारियों पर गाज गिरना तय माना जा रहा है।

क्या आप इस मामले से संबंधित किसी विशिष्ट अधिकारी की भूमिका या पिछले घटनाक्रमों (जैसे FL-10 लाइसेंस घोटाला) के बारे में अधिक विवरण जानना चाहेंगे?

नाम भूमिका
अनिल टुटेजा (IAS) इन्हें इस पूरे सिंडिकेट का 'किंगपिन' माना गया। नीतिगत निर्णय और प्रशासनिक संरक्षण इन्हीं के इशारे पर होता था।
अनवर ढेबर (कारोबारी) यह इस सिंडिकेट का 'कलेक्टर' था। शराब भट्टियों, प्लेसमेंट एजेंसियों और डिस्टिलरी से अवैध वसूली का जिम्मा इन्हीं का था।
ए.पी. त्रिपाठी (MD, CSMCL) सरकारी तंत्र का उपयोग करके घोटाले को अमली जामा पहनाना। नकली होलोग्राम लगवाना और बिना हिसाब की शराब दुकानों तक पहुँचाना इनका काम था।

3. बिना ड्यूटी वाली शराब (Part-A Scandal)

यह इस घोटाले का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा था। सरकारी दुकानों पर दो तरह की शराब बिकती थी:

  1. वैध शराब: जिस पर एक्साइज ड्यूटी लगती थी और पैसा सरकारी खजाने में जाता था।

  2. अवैध शराब (Kachcha Liquor): डिस्टिलरी से सीधे दुकानों तक बिना किसी सरकारी रिकॉर्ड के शराब पहुँचाई जाती थी। इस पर नकली होलोग्राम लगाए जाते थे ताकि जनता को लगे कि यह असली है।

    • इस शराब की बिक्री का 100% पैसा सीधे सिंडिकेट की जेब में जाता था।

    • ED के अनुसार, केवल इस तरीके से सरकारी खजाने को 2,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का चूना लगाया गया।


4. मौजूदा स्थिति और चुनौतियाँ

वर्तमान में EOW और ACB की कार्रवाई ने इस सिंडिकेट की कमर तोड़ दी है।

  • नई कड़ियाँ: हाल ही में जो ओवरटाइम घोटाला सामने आया है, वह दिखाता है कि सिंडिकेट ने कर्मचारियों के हक के पैसे को भी नहीं छोड़ा।

  • डिजिटल साक्ष्य: जांच एजेंसियों ने व्हाट्सएप चैट और डिजिटल ट्रांजेक्शन के जरिए यह साबित किया है कि पैसा नीचे से ऊपर (निचले कर्मचारियों से लेकर बड़े अधिकारियों तक) कैसे पहुंचता था।


अगला कदम: चूंकि अब अनवर ढेबर और नवीन तोमर आमने-सामने बैठकर पूछताछ का सामना करेंगे, कई नए राजदारों के नाम सामने आने की उम्मीद है।

रिपोर्टर:कंचन यादव 

नारद एक्स्प्रेस न्यूज